मेरठ की 121 साल पुरानी गजक को जियोग्राफिक आइडेंटिफिकेशन (जीआई) टैग मिल गया है। यह उपलब्धि न केवल शहर की पारंपरिक मिठाई के लिए गर्व का विषय है, बल्कि इससे गजक और रेवड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान भी मिलेगी। जीआई टैग मिलने के बाद अब यह उत्पाद अपने भौगोलिक मूल के साथ पहचाना जाएगा, जिससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और असली मेरठ की गजक की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
इस मान्यता से गजक-रेवड़ी के कारोबार को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। चार से पांच महीने चलने वाला यह मौसमी उद्योग लगभग 50 से 60 करोड़ रुपये के व्यापार से जुड़ा है और इससे 10 हजार से अधिक लोगों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होती है। जीआई टैग के बाद वैश्विक बाजारों तक पहुंच आसान होगी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी मेरठ के नाम से इस मिठाई की पहचान मजबूत होगी।
121 साल पुरानी परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़ा स्वाद
मेरठ की गजक की कहानी 20वीं सदी की शुरुआत से जुड़ी मानी जाती है। तिल और गुड़ के मेल से तैयार इस मिठाई ने समय के साथ अपने स्वाद, बनावट और विविधता में लगातार सुधार किया। धीरे-धीरे रेवड़ी, पट्टी गजक, रोल गजक और ड्राई फ्रूट से बनी नई किस्में बाजार में आईं, जिन्होंने देश ही नहीं विदेशों में भी पसंद की जाने लगीं। आज मेरठ में दर्जनों इकाइयां इस पारंपरिक मिठाई का निर्माण कर रही हैं और इसका निर्यात कई देशों तक होता है।
ठंड के मौसम में गजक और रेवड़ी को केवल मिठाई नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी उपयोगी माना जाता है। तिल और गुड़ के साथ इसमें इस्तेमाल होने वाले मसाले सर्दियों में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देने में सहायक होते हैं। आमतौर पर नवरात्र से लेकर फरवरी की शुरुआत तक इसकी मांग चरम पर रहती है। जीआई टैग मिलने के साथ ही अब यह पारंपरिक स्वाद न केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में, बल्कि वैश्विक पहचान के साथ आगे बढ़ेगा।